श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 223: इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.223.15 
अदृष्टं बत पश्यामि द्विषतां वशमागतम्।
श्रिया विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आज मैं तुम्हें ऐसी अवस्था में देख रहा हूँ, जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। तुम शत्रुओं के चंगुल में फँस गए हो। तुमने अपना राज-धन और मित्र खो दिए हैं, तुम्हारा बल और पराक्रम नष्ट हो गया है॥ 15॥
 
Today I see you in a condition which I have never seen before. You have fallen into the clutches of enemies. You have lost your royal wealth and friends and your strength and valour have been destroyed.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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