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mahabharat 12.222.d30: सुनो, ईश्वर का वह विश्वरूप ही सबका परम कारण है। जो ईश्वर के उस विश्वरूप को जानता है, वह न तो डरता है, न कहीं जाता है। मैं कहाँ हूँ? मैं किसका हूँ? मैं किसका नहीं हूँ? मैं किससे कर्म करता हूँ? ऐसे विचारों में पड़े बिना, वह ईश्वर का अनुभव करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.222.d30 
शृणुध्वं परमं कारणमस्ति। स एव सर्वं विद्वान् बिभेति न गच्छति। कुत्राहं कस्य नाहं केन केनेत्यवर्तमानो विजानाति।
 
 
अनुवाद
सुनो, ईश्वर का वह विश्वरूप ही सबका परम कारण है। जो ईश्वर के उस विश्वरूप को जानता है, वह न तो डरता है, न कहीं जाता है। मैं कहाँ हूँ? मैं किसका हूँ? मैं किसका नहीं हूँ? मैं किससे कर्म करता हूँ? ऐसे विचारों में पड़े बिना, वह ईश्वर का अनुभव करता है।
 
Listen, that universal form of God is the ultimate cause of everything. One who knows that universal form of God is neither afraid nor goes anywhere. Where am I? Whose am I? Whose am I not? By what means do I work? Without getting into such thoughts, he experiences God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)