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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.222.33 
शक्र उवाच
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते।
प्रब्रूहि तमुपायं मे सम्यक् प्रह्राद पृच्छत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र बोले- प्रह्लादजी! मैं उस उपाय के बारे में पूछ रहा हूँ जिससे ऐसी बुद्धि और ऐसी शांति प्राप्त हो सके। कृपया मुझे स्पष्ट रूप से बताइये।
 
Indra said- Prahladji! I am asking about the method by which one can attain such wisdom and such peace. Please tell me about it clearly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)