Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.222.30: हे इन्द्र! मैं शुद्ध बुद्धि से युक्त तथा मन और इन्द्रियों को वश में करके स्थित हूँ। मैं कामना और कामना से रहित हूँ और सदैव अविनाशी आत्मा पर दृष्टि रखता हूँ, इसीलिए मुझे कभी दुःख नहीं होता॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.222.30 
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिष:।
नायासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकमव्ययम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! मैं शुद्ध बुद्धि से युक्त तथा मन और इन्द्रियों को वश में करके स्थित हूँ। मैं कामना और कामना से रहित हूँ और सदैव अविनाशी आत्मा पर दृष्टि रखता हूँ, इसीलिए मुझे कभी दुःख नहीं होता॥30॥
 
Indra! I am situated with pure intellect and with the mind and senses under my control. I am devoid of any desire and wish and always keep my eyes on the indestructible Self, that is why I never suffer. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)