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mahabharat 12.222.26: जो केवल दोषों (कर्मों) को जानता है और उनके परम स्वरूप (स्वरूप) को नहीं जानता, वह बुद्धि के अभाव से मोह या अभिमान को प्राप्त होता है। जो इसे ठीक से समझ लेता है, उसे मोह नहीं होता॥26॥   |   mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.222.26 
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम्।
तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जो केवल दोषों (कर्मों) को जानता है और उनके परम स्वरूप (स्वरूप) को नहीं जानता, वह बुद्धि के अभाव से मोह या अभिमान को प्राप्त होता है। जो इसे ठीक से समझ लेता है, उसे मोह नहीं होता॥26॥
 
He who knows only the defects (actions) and does not know their ultimate nature (nature), he develops delusion or pride due to lack of wisdom. He who understands this correctly does not have delusion.॥26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)