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mahabharat 12.222.14: प्रह्लादजी बोले - देवराज! जो जीवों के स्वभाव और निवृत्ति को नहीं जानता, वह अविवेक के कारण जड़ता (जड़ता या आसक्ति) को प्राप्त होता है। जिसने आत्मा को जान लिया है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता।   |   mahabharat अध्याय 12.222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 222: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.222.14 
प्रह्राद उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च भूतानां यो न बुद्धॺते।
तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यत:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लादजी बोले - देवराज! जो जीवों के स्वभाव और निवृत्ति को नहीं जानता, वह अविवेक के कारण जड़ता (जड़ता या आसक्ति) को प्राप्त होता है। जिसने आत्मा को जान लिया है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता।
 
Prahladji said – Devraj! One who does not know the nature and retirement of living beings, he becomes stagnant (inertia or attachment) due to indiscretion. One who has realized the soul never gets tempted.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)