श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.219.5 
भीष्म उवाच
तमसा हि प्रतिच्छन्नं विभ्रान्तमिव चातुरम्।
पुन: प्रशमयन् वाक्यै: कवि: पञ्चशिखोऽब्रवीत् ॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन ! राजा जनक का मन अज्ञानरूपी अंधकार से आच्छादित तथा आत्मा के नाश की आशंका से भ्रमित एवं व्याकुल जानकर बुद्धिमान महात्मा पंचशिख ने मधुर वचनों से उन्हें शान्त किया और कहा - 5॥
 
Bhishmaji says – King! Knowing that King Janak's mind was covered with darkness of ignorance and confused and distraught due to the possibility of destruction of the soul, the wise Mahatma Panchshikh calmed him with sweet words and said - 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)