श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.219.49 
द्रुमं यथा वाप्युदके पतन्त-
मुत्सृज्य पक्षी निपतत्यसक्त:।
तथा ह्यसौ सुखदु:खे विहाय
मुक्त: परार्घ्यां गतिमेत्यलिङ्ग:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जैसे पक्षी जल में गिरे हुए वृक्ष को देखकर उसमें आसक्ति त्याग देता है और वृक्ष को त्यागकर उड़ जाता है, उसी प्रकार मुक्त पुरुष सुख-दुःख दोनों का त्याग करके सूक्ष्म शरीर से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है ॥49॥
 
Just as a bird, seeing a tree falling into water, gives up its attachment to it and flies away, abandoning the tree, in the same way, a liberated man, renouncing both happiness and sorrow, and being free from the subtle body, attains the supreme state of being. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)