श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.219.48 
यथा रुरु: शृङ्गमथो पुराणं
हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथा च।
विहाय गच्छत्यनवेक्षमाण-
स्तथा विमुक्तो विजहाति दु:खम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
जैसे रुरु नामक मृग अपने पुराने सींगों को त्याग देता है और साँप अपने केंचुल को त्यागकर उनकी ओर देखे बिना ही आगे बढ़ जाता है, उसी प्रकार आसक्ति और अभिमान से रहित मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और अपने समस्त दुःखों को दूर कर देता है ॥ 48॥
 
Just as the deer named Ruru sheds its old horns and the snake sheds its skin and moves on without looking at them, similarly a man, devoid of attachment and pride, becomes free from the bonds of the world and removes all his sorrows. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)