श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.219.40 
एतदाहु: समाहारं क्षेत्रमध्यात्मचिन्तका:।
स्थितो मनसि यो भाव: स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
अध्यात्म तत्त्व का चिंतन करने वाले विद्वान इस शरीर और इन्द्रियों के संयोग को क्षेत्र कहते हैं और मन में स्थित चेतन सत्ता को क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कहते हैं। 40॥
 
Scholars who contemplate on the spiritual principle call the combination of this body and the senses as Kshetra and the conscious being present in the mind is called Kshetragya (soul). 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)