श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.219.18 
द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि।
सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना॥ १८॥
 
 
अनुवाद
शास्त्रों में पदार्थों के त्याग के लिए यज्ञ, भोगों के त्याग के लिए व्रत, भौतिक सुखों के त्याग के लिए तप और सब कुछ (अहंकार, मोह, आसक्ति, कामना आदि) त्यागने के लिए योगाभ्यास करने का विधान बताया गया है। यही त्याग की परम सीमा है। 18॥
 
In the scriptures, it has been prescribed to perform rituals like yajna to give up material things, fast to give up pleasures, penance to give up physical pleasures and rituals of yoga to give up everything (egoism, attachment, attachment, desire etc.). This is the ultimate limit of renunciation. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)