श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.217.15 
त्रैलोक्यं तपसा व्याप्तमन्तर्भूतेन भास्वता।
सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव भासतस्तपसा दिवि॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आन्तरिक तप चेतन प्रकाश से परिपूर्ण है। तीनों लोक उससे व्याप्त हैं। आकाश में सूर्य और चन्द्रमा भी तप के कारण ही चमक रहे हैं ॥15॥
 
Internal penance is filled with conscious light. All the three worlds are pervaded by it. The sun and the moon in the sky are also shining due to penance. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)