श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  12.217.1-3 
भीष्म उवाच
न स वेद परं ब्रह्म यो न वेद चतुष्टयम्।
व्यक्ताव्यक्तं च यत् तत्त्वं सम्प्रोक्तं परमर्षिणा॥ १॥
व्यक्तं मृत्युमुखं विद्यादव्यक्तममृतं पदम्।
प्रवृत्तिलक्षणं धर्ममृषिर्नारायणोऽब्रवीत् ॥ २॥
तत्रैवावस्थितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
निवृत्तिलक्षणं धर्ममव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! जो मनुष्य सच्चिदानन्दघन ईश्वर, दृश्य वर्ग, प्रकृति और पुरुष को नहीं जानता, वह परब्रह्म परमात्मा को नहीं जानता। परम ऋषि नारायण द्वारा प्रतिपादित व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वों में व्यक्त (दृश्य) को मृत्यु के भय से युक्त और अव्यक्त को अमर माना गया है तथा नारायण ऋषि द्वारा प्रतिपादित प्रकृति-स्वरूप धर्म ही प्राणियों सहित सम्पूर्ण जगत पर आधारित है। जो निवृत्तिरूप धर्म है, वही अव्यक्त सनातन ब्रह्मस्वरूप है। 1-3॥
 
Bhishmaji says – King! The man who does not know the Sachchidanandaghan God, visible class, nature and man, he does not know the Supreme God. In the manifest and unmanifested elements propounded by Param Rishi Narayan, the visible (visible) is considered to be at the risk of death and the unmanifest is considered as immortal and the nature-form religion propounded by Narayan Rishi is based on the whole world including living beings. The religion which is in the form of retirement is the unmanifested eternal form of Brahma. 1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)