श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.215.7 
यश्चैनं परमं धर्मं सर्वभूतसुखावहम्।
दु:खान्नि:सरणं वेद सर्वज्ञ: स सुखी भवेत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य इस अहिंसारूप परम धर्म को जानता है, जो समस्त प्राणियों के लिए सुखदायक और दुःखनाशक है, वही सर्वज्ञ है और वही सुखी है ॥7॥
 
A man who knows this supreme religion of non-violence, which is pleasant and pain-relieving for all creatures, he alone is omniscient and he alone is happy. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)