श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.215.3 
वाङ्मनोभ्यां शरीरेण शुचि: स्यादनहंकृत:।
प्रशान्तो ज्ञानवान् भिक्षुर्निरपेक्षश्चरेत् सुखम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह मन, वाणी और शरीर से शुद्ध रहे, अहंकाररहित, शान्त, ज्ञानी और निष्काम हो तथा भिक्षा के मार्ग पर चलते हुए सुखपूर्वक विचरण करे॥3॥
 
He should remain pure in mind, speech and body, be egoless, peaceful, knowledgeable and disinterested and move around happily, following the path of begging. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)