| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश » श्लोक 16-17 |
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| | | | श्लोक 12.215.16-17  | नि:संदिग्धमनीहो वै मुक्त: सर्वपरिग्रहै:।
विविक्तचारी लघ्वाशी तपस्वी नियतेन्द्रिय:॥ १६॥
ज्ञानदग्धपरिक्लेश: प्रयोगरतिरात्मवान्।
निष्प्रचारेण मनसा परं तदधिगच्छति॥ १७॥ | | | | | | अनुवाद | | जो सब प्रकार के संग्रहों से रहित, असहाय, एकाकी, अल्पाहार करने वाला, तपस्वी और समस्त इन्द्रियों से वश में रहने वाला है, जिसका सम्पूर्ण दुःख ज्ञानरूपी अग्नि से भस्म हो गया है; तथा जो योगानुष्ठानों का प्रेमी है और जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह निःसंदेह अपने शान्त मन से परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है॥16-17॥ | | | | Who is devoid of all kinds of accumulations, helpless, solitary, eater of little food, ascetic and of all senses, whose entire sufferings have been burnt by the fire of knowledge; And the one who is a lover of yoga rituals and has control over his mind, he undoubtedly attains the Supreme God through his calm mind. 16-17॥ | | ✨ ai-generated | | |
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