श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.215.15 
तमेव च यथा दस्यु: क्षिप्त्वा गच्छेच्छिवां दिशम्।
तथा रजस्तम: कर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुयाच्छुभम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे चोर या डाकू चोरी का माल फेंककर अनायास ही उस दिशा में चला जाता है जहाँ उसे सुख मिलने की आशा होती है। उसी प्रकार मनुष्य राजस और तामस कर्मों का त्याग करके शुभ गति को प्राप्त होता है॥ 15॥
 
Just as when a thief or a robber throws away the load of stolen goods, he involuntarily goes in the direction where he hopes to find happiness. In the same way, a man, by abandoning Rajas and Tamas Karmas, attains auspiciousness.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)