श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.215.13 
रजोभूतैर्हि करणै: कर्मणि प्रतिपद्यते।
स दु:खं प्राप्य लोकेऽस्मिन् नरकायोपपद्यते।
तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद् धैर्यमात्मन:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
रजोगुण से प्रभावित इन्द्रियों की प्रेरणा से मनुष्य विषय-कर्मों में प्रवृत्त होता है और इस लोक में दुःख भोगकर अन्त में नरक को प्राप्त होता है। अतः मन, वाणी और शरीर से ऐसा कर्म करो जिससे तुम्हें धैर्य प्राप्त हो। 13॥
 
Due to the inspiration of the senses influenced by Rajogun, man gets engaged in sensual activities and after suffering sorrow in this world, he ultimately goes to hell. Therefore, do such work through mind, speech and body that you gain patience. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)