श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.215.10-11 
विवक्षता च सद्वाक्यं धर्मं सूक्ष्ममवेक्षता।
सत्यां वाचमहिंस्रां च वदेदनपवादिनीम्॥ १०॥
कल्कापेतामपरुषामनृशंसामपैशुनाम्।
ईदृगल्पं च वक्तव्यमविक्षिप्तेन चेतसा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो सूक्ष्म धर्म को देखता है और अच्छे वचन बोलना चाहता है, उसे ऐसे वचन बोलने चाहिए जो सत्य हों, हिंसा और चुगली से रहित हों। जिनमें बेईमानी, कठोरता, क्रूरता और चुगली आदि बुराइयाँ बिलकुल न हों। ऐसे वचन भी बहुत कम मात्रा में और स्थिर मन से बोलने चाहिए। 10-11.
 
One who sees the subtle religion and wants to speak good words, should speak such words which are true and free from violence and backbiting. In which there is absolutely no evil like dishonesty, harshness, cruelty and gossiping etc. Such words should also be spoken in very small quantity and with a stable mind. 10-11.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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