श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.215.1 
भीष्म उवाच
दुरन्तेष्विन्द्रियार्थेषु सक्ता: सीदन्ति जन्तव:।
ये त्वसक्ता महात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्द्रियों के विषयों पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। जो प्राणी उनमें आसक्त रहते हैं, वे दुःख भोगते रहते हैं; और जो महात्मा उनमें आसक्त नहीं रहते, वे परम मोक्ष को प्राप्त होते हैं।॥1॥
 
Bhishma says - Yudhishthira! It is very difficult to overcome the objects of the senses. Those beings who are attached to them keep on suffering; and those great souls who are not attached to them attain the ultimate salvation. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)