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mahabharat 12.214.29: वह परिपक्व बुद्धिवाला पुरुष अत्यन्त कठिन मार्ग के समान गुणों के बंधन को पार करके, अपने दोषों को देखकर, उन पर विजय पाकर, भगवान् के अमृत को प्राप्त होता है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.214.29 
सुदुर्गमिव पन्थानमतीत्य गुणबन्धनम्।
यथा पश्येत् तथा दोषानतीत्यामृतमश्नुते॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वह परिपक्व बुद्धिवाला पुरुष अत्यन्त कठिन मार्ग के समान गुणों के बंधन को पार करके, अपने दोषों को देखकर, उन पर विजय पाकर, भगवान् के अमृत को प्राप्त होता है ॥29॥
 
That man with a mature mind, crossing the bondage of qualities like a very difficult path, as he sees his faults, overcomes them and attains the nectar of God. 29॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मकथनविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)