श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 212: निषिद्ध आचरणके त्याग, सत्त्व, रज और तमके कार्य एवं परिणामका तथा सत्त्वगुणके सेवनका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.212.5 
नाशुद्धमाचरेत् तस्मादभीप्सन् देहयापनम्।
कर्मणा विवरं कुर्वन्न लोकानाप्नुयाच्छुभान्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अतः जो मनुष्य देह के बंधन से मुक्त होना चाहता है, उसे कभी भी अशुद्ध (अवैध) आचरण नहीं करना चाहिए। उसे निष्काम कर्मों द्वारा मोक्ष का द्वार खोलना चाहिए और स्वर्ग आदि पवित्र लोकों की प्राप्ति की कभी इच्छा नहीं करनी चाहिए। 5॥
 
Therefore, one who wants to be free from the bondage of the body should never engage in impure (illegal) conduct. He should open the door to salvation through selfless deeds and never wish to attain the sacred world like heaven etc. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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