श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 212: निषिद्ध आचरणके त्याग, सत्त्व, रज और तमके कार्य एवं परिणामका तथा सत्त्वगुणके सेवनका उपदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.212.1 
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो यथा समुपलभ्यते।
तेषां विज्ञाननिष्ठानामन्यत्तत्त्वं न रोचते॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! जैसे कर्म में तत्पर रहने वाले पुरुष संसार के धर्म की प्राप्ति को पसंद करते हैं, वैसे ही ज्ञान में तत्पर रहने वाले पुरुष ज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को पसंद नहीं करते॥1॥
 
Bhishma says - King! Just as those who are devoted to action like the attainment of the Dharma of the world, similarly those who are devoted to knowledge like nothing else except knowledge.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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