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mahabharat 12.211.1: गुरुजी कहते हैं - वत्स! जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज - ये चार प्रकार के स्थावर और जंगम प्राणी अव्यक्त से उत्पन्न कहे गए हैं और इन सबकी लय अव्यक्त में ही है। जिसमें कोई प्रत्यक्ष लक्षण न हो, उसे अव्यक्त समझना चाहिए। मन अव्यक्त प्रकृति के समान ही त्रिगुणात्मक है। 1॥   |   mahabharat अध्याय 12.211: संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 211: संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.211.1 
गुरुरुवाच
चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।
अव्यक्तप्रभवान्याहुरव्यक्तनिधनानि च।
अव्यक्तलक्षणं विद्यादव्यक्तात्मात्मकं मन:॥ १॥
 
 
अनुवाद
गुरुजी कहते हैं - वत्स! जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज - ये चार प्रकार के स्थावर और जंगम प्राणी अव्यक्त से उत्पन्न कहे गए हैं और इन सबकी लय अव्यक्त में ही है। जिसमें कोई प्रत्यक्ष लक्षण न हो, उसे अव्यक्त समझना चाहिए। मन अव्यक्त प्रकृति के समान ही त्रिगुणात्मक है। 1॥
 
Guruji says – Vatsa! Jarayuj, Andaj, Swedaj and Udbhijja – these four types of immovable and movable beings are said to have originated from the Avyakt and all of them have their rhythm in the Avyakt. The one which has no visible symptoms should be considered latent. The mind is as triple as the unmanifested nature. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)