श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 210: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.210.26 
दीपादन्ये यथा दीपा: प्रवर्तन्ते सहस्रश:।
प्रकृति: सूयते तद्वदानन्त्यान् नापचीयते॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार एक दीपक से हजारों दीपक जलाए जा सकते हैं और पहले दीपक को कोई हानि नहीं पहुँचती, उसी प्रकार एक प्रकृति असंख्य पदार्थों को उत्पन्न करती है और अनंत होने के कारण उसका नाश नहीं होता।
 
Just as thousands of lamps can be lit from one lamp and the first lamp is not harmed, similarly the one Prakriti (nature) produces innumerable substances and because of being infinite, it does not get destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)