Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.210.17: जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ भिन्न-भिन्न ऋतुओं की विभिन्न प्रकार की विशेषताएं प्रकट होती रहती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक कल्प के प्रारम्भ में भी पूर्व कल्प के अनुरूप भाव प्रकट होते रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.210: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 210: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.210.17 
यथर्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ भिन्न-भिन्न ऋतुओं की विभिन्न प्रकार की विशेषताएं प्रकट होती रहती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक कल्प के प्रारम्भ में भी पूर्व कल्प के अनुरूप भाव प्रकट होते रहते हैं।
 
Just as with the change of seasons, various types of characteristics of different seasons keep appearing, similarly at the beginning of each Kalpa, corresponding sentiments keep getting expressed as per the previous Kalpa.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)