श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 207: श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन  »  श्लोक d15-d16
 
 
श्लोक  12.207.d15-d16 
भीष्म उवाच
स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनि:।
प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम्॥
विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत।
तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! नारद मुनि प्रेम से विह्वल होकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले तथा सदैव हृदय में निवास करने वाले भगवान् का अभिवादन करते हुए बोले - 'प्रभु! प्रसन्न होइए। जगन्नाथ! अच्युत! हृषिकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह आप जानते ही हैं। मैं वही सुनना चाहता हूँ। मुझ पर कृपा कीजिए।'
 
Bhishma says - Yudhishthira! Muni Narada, overwhelmed with love, while hailing the Lord who holds conch, discus and mace and resides in his heart always, said - 'Prabhu! Be pleased. Jagannath! Achyuta! Hrishikesh! Hare! Whatever I want to say, you already know it. I want to hear the same. Please be kind to me.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)