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mahabharat 12.206.32: जो कहीं से नहीं आया है, जो नित्य है, जो पुण्यात्माओं का परम गन्तव्य है, जो स्वयंभू (अजन्मा) है, जो सबका उत्पत्ति और विनाश का स्थान है, जो अविनाशी और नित्य है, अमर है, अपरिवर्तनीय है और अचल है, उस परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परम मोक्ष को प्राप्त होता है॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.206.32 
अनागतं सुकृतवतां परां गतिं
स्वयम्भुवं प्रभवनिधानमव्ययम्।
सनातनं यदमृतमव्ययं ध्रुवं
निचाय्य तत् परममृतत्वमश्नुते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो कहीं से नहीं आया है, जो नित्य है, जो पुण्यात्माओं का परम गन्तव्य है, जो स्वयंभू (अजन्मा) है, जो सबका उत्पत्ति और विनाश का स्थान है, जो अविनाशी और नित्य है, अमर है, अपरिवर्तनीय है और अचल है, उस परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परम मोक्ष को प्राप्त होता है॥ 32॥
 
The One who has not come from anywhere, who exists eternally, who is the ultimate destination for the virtuous, who is Swayambhu (unborn), who is the place of origin and destruction of all, who is indestructible and eternal, immortal, unchangeable and immovable, by acquiring the knowledge of that Supreme Being a man attains the ultimate salvation. ॥ 32॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे षडधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादरूप दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ॥ २०६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)