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mahabharat 12.206.28: मनुष्य का आत्मा (वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीर रूप में व्यक्त होते हैं। अतः अन्त में वह अव्यक्त भाव को प्राप्त होता है। किन्तु वह आत्मा, जो कामनाओं के अधीन हो गई है, उन बढ़ी हुई इन्द्रियों से युक्त होकर पुनः संसार में आती है, अर्थात् पुनः शरीर धारण करती है। 28॥   |   mahabharat अध्याय 12.206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 206: परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.206.28 
अव्यक्तात्मा पुरुषो व्यक्तकर्मा
सोऽव्यक्तत्वं गच्छति ह्यन्तकाले।
तैरेवायं चेन्द्रियैर्वर्धमानै-
र्ग्लायद्भिर्वाऽऽवर्ततेऽकामरूप:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य का आत्मा (वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीर रूप में व्यक्त होते हैं। अतः अन्त में वह अव्यक्त भाव को प्राप्त होता है। किन्तु वह आत्मा, जो कामनाओं के अधीन हो गई है, उन बढ़ी हुई इन्द्रियों से युक्त होकर पुनः संसार में आती है, अर्थात् पुनः शरीर धारण करती है। 28॥
 
The soul (real form) of the man is unexpressed and his actions are expressed in the body form. Therefore, in the end, he attains the unmanifested feeling. But that soul, which has become dependent on desires, comes back into the world after being equipped with those increased sensual senses, that is, it again assumes a body. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)