गुणहीनो हि तं मार्गं बहि: समनुवर्तते।
गुणाभावात् प्रकृत्या वा निस्तर्क्यं ज्ञेयसम्मितम्॥ २०॥
अनुवाद
तप आदि गुणों से रहित मनुष्य बाहर ही रहता है और बाह्य मार्ग का ही अनुसरण करता है। वह जानने योग्य भगवान् का स्वरूप गुणों से परे होने के कारण स्वभावतः तर्क का विषय नहीं है। 20॥
A person devoid of the qualities like austerity etc. stays outside and follows the external path only. That knowable form of God is not a subject of logic by nature because it is beyond the qualities. 20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥