vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व
»
श्लोक 6
श्लोक
12.204.6
तर्षच्छेदो न भवति पुरुषस्येह कल्मषात्।
निवर्तते तदा तर्ष: पापमन्तगतं यदा॥ ६॥
अनुवाद
पाप के कारण ही इस संसार में मनुष्य की प्यास का अन्त नहीं है। पाप समाप्त होने पर ही उसकी प्यास बुझती है। 6॥
It is because of sin that there is no end to man's thirst in this world. Only when the sins are finished, his thirst is quenched. 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×