श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.204.6 
तर्षच्छेदो न भवति पुरुषस्येह कल्मषात्।
निवर्तते तदा तर्ष: पापमन्तगतं यदा॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पाप के कारण ही इस संसार में मनुष्य की प्यास का अन्त नहीं है। पाप समाप्त होने पर ही उसकी प्यास बुझती है। 6॥
 
It is because of sin that there is no end to man's thirst in this world. Only when the sins are finished, his thirst is quenched. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)