श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 204: आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय तथा महत्त्व  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.204.3 
स एव लुलिते तस्मिन् यथा रूपं न पश्यति।
तथेन्द्रियाकुलीभावे ज्ञेयं ज्ञाने न पश्यति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार मनुष्य बहते हुए जल में अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता, उसी प्रकार जब मन सहित उसकी इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, तब वह अपनी बुद्धि में स्थित ज्ञेय आत्मा को नहीं देख पाता।
 
Just as a man cannot see his own reflection in the moving water, similarly, when his senses including the mind are fickle, he cannot see the knowable Self in his intellect.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)