यतो गृहीत्वा हि करोति यच्च
यस्मिंश्च तामारभते प्रवृत्तिम्।
यस्मिंश्च यद् येन च यश्च कर्ता
यत् कारणं ते समुदायमाहु:॥ ६॥
अनुवाद
महर्षि कहते हैं कि जो भी कारण से, जिस भी परिणाम से, जिस भी देश या काल में, जिस भी प्रिय या अप्रिय कारण से, जिस भी राग या द्वेष से प्रभावित होकर, कर्ममार्ग का आश्रय लेकर जो भी कर्म करता है, उन सबका कारण परब्रह्म परमात्मा ही है, जो इन सबका साकार स्वरूप है। ॥6॥
The great sages say that whatever reason, for whatever result, in whatever place or time, for whatever liked or disliked reason, influenced by whatever love or hatred, whatever action he performs by taking recourse to the path of action, the cause of all these is the Supreme Brahma, the Supreme Soul, who is the embodiment of all these. ॥ 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥