श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.202.3 
नोष्णं न शीतं मृदु नापि तीक्ष्णं
नाम्लं कषायं मधुरं न तिक्तम्।
न शब्दवन्नापि च गन्धवत्त-
न्न रूपवत्तत् परमस्वभावम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह दिव्य तत्त्व न तो गर्म है, न शीतल, न कोमल, न तीक्ष्ण, न खट्टा, न कसैला, न मधुर, न कड़वा। वह शब्द, गंध और रूप से भी रहित है। उसका स्वरूप परम उत्तम और अद्वितीय है। ॥3॥
 
That divine element is neither hot nor cold, neither soft nor sharp, neither sour nor astringent, neither sweet nor bitter. It is also devoid of sound, smell and form. Its form is the most excellent and unique. ॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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