श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 202: आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.202.16 
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो
न चापि संस्पर्शमुपैति किंचित्।
न चापि तै: साधयते तु कार्यं
ते तं न पश्यन्ति स पश्यते तान्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आत्मा के स्वरूप को इन स्थूल नेत्रों से कोई नहीं देख सकता। उसे अपनी त्वचा से भी स्पर्श नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह है कि आत्मा को जानने का कोई कार्य इन्द्रियों से नहीं किया जा सकता। ये इन्द्रियाँ उसे नहीं देखतीं; परन्तु वह आत्मा उन सबको देखता है॥16॥
 
No one can see the nature of the soul with these physical eyes. One cannot even touch it with his skin. The meaning is that no work of knowing the soul can be done with the senses. Those senses do not see it; but that soul sees them all.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)