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mahabharat 12.201.13h: बृहस्पति बोले - "हे प्रभु! सभी लोग सुख चाहते हैं, दुःख किसी को प्रिय नहीं है। इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति और अशुभ से बचने की इच्छा ही मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है और उन कर्मों के द्वारा अपनी कामनाओं की पूर्ति करती है; अतः आप यह कैसे कहते हैं कि उस इच्छा का त्याग कर देना चाहिए?"॥12 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.201.13h 
बृहस्पतिरुवाच
इष्टं त्वनिष्टं च सुखासुखे च
साशीस्त्ववच्छन्दति कर्मभिश्च।
 
 
अनुवाद
बृहस्पति बोले - "हे प्रभु! सभी लोग सुख चाहते हैं, दुःख किसी को प्रिय नहीं है। इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति और अशुभ से बचने की इच्छा ही मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है और उन कर्मों के द्वारा अपनी कामनाओं की पूर्ति करती है; अतः आप यह कैसे कहते हैं कि उस इच्छा का त्याग कर देना चाहिए?"॥12 1/2॥
 
Brihaspati said, "O Lord! Everyone desires happiness and no one likes sorrow. The desire to achieve desired things and to avoid evil, is what makes people perform actions and fulfils their wishes through those actions; so how do you say that desire should be discarded?"॥12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)