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mahabharat 12.201.13: मनु ने कहा - मनुष्य को इन कामनाओं से मुक्त होकर निष्काम भाव से कर्म करके परब्रह्म को प्राप्त करना चाहिए। इसी उद्देश्य से कर्मों का विधान बनाया गया है। वेदों में स्वर्ग आदि की कामना से जो योगादि कर्म बनाए गए हैं, वे उन्हीं मनुष्यों को फँसाते हैं जिनका मन भोगों में आसक्त रहता है। वास्तव में इन कामनाओं से दूर रहकर केवल ईश्वर प्राप्ति का ही प्रयत्न करो (केवल ईश्वर प्राप्ति के लिए ही कर्म करो, तुच्छ भोगों के लिए नहीं)। 13॥   |   mahabharat अध्याय 12.201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 201: बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.201.13 
मनुरुवाच
एभिर्विमुक्त: परमाविवेश
एतत् कृते कर्मविधि: प्रवृत्त:।
कामात्मकांश्छन्दति कर्मयोग
एभिर्विमुक्त: परमाददीत॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मनु ने कहा - मनुष्य को इन कामनाओं से मुक्त होकर निष्काम भाव से कर्म करके परब्रह्म को प्राप्त करना चाहिए। इसी उद्देश्य से कर्मों का विधान बनाया गया है। वेदों में स्वर्ग आदि की कामना से जो योगादि कर्म बनाए गए हैं, वे उन्हीं मनुष्यों को फँसाते हैं जिनका मन भोगों में आसक्त रहता है। वास्तव में इन कामनाओं से दूर रहकर केवल ईश्वर प्राप्ति का ही प्रयत्न करो (केवल ईश्वर प्राप्ति के लिए ही कर्म करो, तुच्छ भोगों के लिए नहीं)। 13॥
 
Manu said - Man should become free from these desires and attain the Supreme God by performing his deeds selflessly. For this very purpose, the law of deeds has been made. The Yogadi deeds which have been made in the Vedas due to the desire of heaven etc. trap only those people whose mind is engrossed in pleasures. In reality, stay away from these desires and try to attain God only (do work only to attain God, not for petty pleasures). 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)