श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 200: जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.200.7 
राजोवाच
यद्येवमफला सिद्धि: श्रद्धा च जपितुं तव।
गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा - ब्राह्मण! यदि इस प्रकार मुझे फल अर्पित करने से तुम्हें फल नहीं मिल रहा है और फिर भी तुम्हारा पुनः जप करने में विश्वास है, तो मेरे साथ आओ और जप तथा दान का फल प्राप्त करो।
 
The king said - Brahmin! If you are not getting the fruits of offering the fruits to me in this manner and you still have faith in doing the Japa again, then come with me and get the fruits of Japa and Daan. 7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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