श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 200: जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.200.29 
योगजापकयोर्दृष्टं फलं सुमहदद्य वै।
सर्वाल्‍ँलोकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
‘आज हमने योगी और जापक का महान लाभ देखा है। वे सम्पूर्ण लोकों को पार करके जहाँ चाहें वहाँ जा सकते हैं।’॥29॥
 
‘Today we have seen the great benefits of a Yogi and a Japaka. They can cross all the worlds and go wherever they wish.’॥ 29॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas