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श्लोक 12.200.29  |
योगजापकयोर्दृष्टं फलं सुमहदद्य वै।
सर्वाल्ँलोकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| ‘आज हमने योगी और जापक का महान लाभ देखा है। वे सम्पूर्ण लोकों को पार करके जहाँ चाहें वहाँ जा सकते हैं।’॥29॥ |
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| ‘Today we have seen the great benefits of a Yogi and a Japaka. They can cross all the worlds and go wherever they wish.’॥ 29॥ |
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