श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 200: जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.200.28 
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थं वयमागता:।
कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ॥ २८॥
 
 
अनुवाद
आपने इस जप ब्राह्मण को मोक्ष प्रदान करने के लिए ऐसा प्रयत्न किया था। हम भी यही देखने आए थे। आपने उन दोनों का समान रूप से आदर किया और वे दोनों एक ही गति को प्राप्त होकर आपके समान ही फल प्राप्त कर चुके हैं।॥ 28॥
 
‘You had made such efforts to grant salvation to this Japa Brahmin. We too had come to see this. You respected both of them equally and both of them, having reached the same state, have received the same fruits as you.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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