श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 200: जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  12.200.17-18 
प्राणापानौ तथोदानं समानं व्यानमेव च।
एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतु: प्राणयोर्मन:॥ १७॥
उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवो:।
भ्रुकुटॺा चैव मनसा शनैर्धारयतस्तदा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन्होंने प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान - इन पाँचों प्राणों को हृदय में स्थापित किया। इस प्रकार स्थित होकर उन्होंने मन को प्राण और अपान के साथ एक कर दिया। भौंहों के नीचे नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखकर उन्होंने प्राण-अपान को मन सहित भौंहों के मध्य स्थिर कर दिया।॥17-18॥
 
Thereafter they established the five vital airs - Prana, Apana, Udana, Samana and Vyana - in the heart. Thus situated, they merged the mind with Prana and Apana. Keeping their gaze on the tip of the nose below the eyebrows, they stabilized Prana-Apana along with the mind between the eyebrows.॥17-18॥
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