श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  12.199.84 
भीष्म उवाच
ततो विकृतवेषौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ।
गृहीत्वान्योन्यमावेष्टॺ कुचैलावूचतुर्वच:॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! उसी समय भयंकर वेश वाले दो पुरुष वहाँ प्रकट हुए। उन दोनों ने एक-दूसरे को पकड़ रखा था और एक-दूसरे का आलिंगन कर रखा था। दोनों के शरीर पर मैले वस्त्र थे (उनमें से एक का नाम विकृत था और दूसरे का विरूप)। वे दोनों बार-बार ऐसा कह रहे थे।
 
Bhishmaji says - King! At this time two men with fierce disguise appeared there. Both of them had held each other and had embraced each other with their hands. Both of them had dirty clothes on their body (one of them was named Vikrit and the other was named Virup). Both of them were saying this repeatedly. 84.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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