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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन
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श्लोक 55
श्लोक
12.199.55
नाभिसंधिर्मया जप्ये कृतपूर्व: कदाचन।
जप्यस्य राजशार्दूल कथं वेत्स्याम्यहं फलम्॥ ५५॥
अनुवाद
हे राजासिंह! मैंने जप करते समय कभी फल की इच्छा नहीं की; अतः मैं इस जप का फल कैसे जान सकूँगा?॥ 55॥
O King Singh! I never desired any result while chanting; so how will I be able to know the result of this chanting?॥ 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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