ब्राह्मण उवाच
परमं गृह्यतां तस्य फलं यज्जपितं मया।
अर्धं त्वमविचारेण फलं तस्य ह्यवाप्नुहि॥ ४९॥
अथवा सर्वमेवेह मामकं जापकं फलम्।
राजन् प्राप्नुहि कामं त्वं यदि सर्वमिहेच्छसि॥ ५०॥
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - "हे राजन! मेरे द्वारा किये गये जप का जो उत्तम फल है, उसे आप स्वीकार करें। आप मेरे जप का आधा फल बिना विचारे ही प्राप्त कर लें अथवा यदि आप मेरे द्वारा किये गये जप का सम्पूर्ण फल चाहते हैं, तो अपनी इच्छानुसार अवश्य प्राप्त करें।" ॥49-50॥
The Brahmin said, "O King! Please accept the best result of the chanting I have done. You may receive half the result of my chanting without any consideration or if you want the entire result of the chanting done by me, then you may certainly receive it according to your wish. ॥ 49-50॥