श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.199.42 
राजोवाच
क्षत्रियोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् ।
प्रयच्छ युद्धमित्येवंवादिन: स्मो द्विजोत्तम॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
राजा बोले - "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैं क्षत्रिय हूँ। 'मुझे दो' कहकर भिक्षा माँगना मैं कभी नहीं जानता। माँगने के नाम पर हम केवल 'मुझे युद्ध दो' कहना ही जानते हैं॥ 42॥
 
The king said, "O best of the Brahmins! I am a Kshatriya. I never know how to beg by saying 'give me'. In the name of asking, we only know to say, 'give me war'.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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