श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  12.199.120 
स तैजसेन भावेन यदि तत्र रमत्युत।
गुणांस्तेषां समाधत्ते रागेण प्रतिमोहित:॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
यदि वह जप करनेवाला अपने शरीर के समान तेजस्वी शरीर से उन लोकों में रमण करता है, तो वह काम से मोहित होकर उनके गुणों को अपने अन्दर धारण कर लेता है ॥120॥
 
If that chanter rejoices in those worlds with a body as bright as his body, then he gets captivated by passion and imbibes their qualities within himself. 120॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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