श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  12.199.107 
यदि तावन्न गृह्णामि ब्राह्मणेनापवर्जितम्।
कथं न लिप्येयमहं पापेन महताद्य वै॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं आज ब्राह्मण द्वारा दिया गया प्रसाद ग्रहण न करूँ तो इस महापाप से कैसे मुक्त होऊँगा? ॥107॥
 
If I do not accept the offering made by a Brahmin today, how will I be free from this great sin? ॥107॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)