vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 199: जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन,राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन
»
श्लोक 107
श्लोक
12.199.107
यदि तावन्न गृह्णामि ब्राह्मणेनापवर्जितम्।
कथं न लिप्येयमहं पापेन महताद्य वै॥ १०७॥
अनुवाद
यदि मैं आज ब्राह्मण द्वारा दिया गया प्रसाद ग्रहण न करूँ तो इस महापाप से कैसे मुक्त होऊँगा? ॥107॥
If I do not accept the offering made by a Brahmin today, how will I be free from this great sin? ॥107॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×