श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 198: परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवलोक भी नरक-तुल्य हैं—इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.198.2 
भीष्म उवाच
धर्मस्यांशप्रसूतोऽसि धर्मिष्ठोऽसि स्वभावत:।
धर्ममूलाश्रयं वाक्यं शृणुष्वावहितोऽनघ॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - अनघ! तुम धर्म के अंश से उत्पन्न हुए हो और स्वभाव से ही धार्मिक हो; अतः सावधान होकर धर्म के मूल वेद और ईश्वर के साथ सम्बन्ध के विषय में मुझसे सुनो॥2॥
 
Bhishmaji said – Anagh! You are born from a part of religion and are religious by nature; Therefore, be careful and listen to me regarding the fundamental Vedas of religion and the relationship with God. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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