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श्लोक 12.198.1  |
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशं निरयं याति जापको वर्णयस्व मे।
कौतूहलं हि राजन् मे तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! जप करने वाला मनुष्य अपने दोषों के कारण किस नरक में जाता है? कृपया मुझे उसका वर्णन कीजिए। राजन! मुझे उसके विषय में जानने की बड़ी जिज्ञासा है; अतः आप मुझे अवश्य बताइए।॥1॥ |
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| Yudhishthira asked- Grandfather! What kind of hell does a person who does Japa go to due to his faults? Please describe it to me. King! I am very curious to know about it; hence you must tell me.॥ 1॥ |
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