Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.196.8-9h: उपनिषदों के वाक्य निर्वृति (आनंद), शांति और ब्रह्मभक्ति का ज्ञान देते हैं (इसलिए जप की आवश्यकता नहीं है)। सांख्य और योग, जिन्हें समदृष्टि से ऋषियों ने बताया है, वे दोनों मन को शुद्ध करके ज्ञान प्राप्ति में सहायक होने के कारण जप का आश्रय लेते भी हैं और नहीं भी लेते। 8 1/2। | mahabharat अध्याय 12.196: जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वेदवादाश्च निर्वृत्ता: शान्ता ब्रह्मण्यवस्थिता:।
सांख्ययोगौ तु यावुक्तौ मुनिभि: समदर्शिभि:॥ ८॥
मार्गौ तावप्युभावेतौ संश्रितौ न च संश्रितौ।
अनुवाद
उपनिषदों के वाक्य निर्वृति (आनंद), शांति और ब्रह्मभक्ति का ज्ञान देते हैं (इसलिए जप की आवश्यकता नहीं है)। सांख्य और योग, जिन्हें समदृष्टि से ऋषियों ने बताया है, वे दोनों मन को शुद्ध करके ज्ञान प्राप्ति में सहायक होने के कारण जप का आश्रय लेते भी हैं और नहीं भी लेते। 8 1/2।
The sentences of the Upanishads give the knowledge of Nirvriti (bliss), peace and devotion to Brahma (therefore there is no need of Japa). The Sankhya and Yoga, which have been told by the sages with equal vision, both take the help of Japa as they are helpful in acquiring knowledge by purifying the mind, and also do not take it. 8 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥